भक्त समाज ऐसे भगवान् की तलाश में है,जो उन्हें सर्व सुख प्रदान कर सके परन्तु अफसोस! इस बात का है कि हमें आज तक ऐसा भगवान् नहीं मिला।
सभी अलग-अलग भगवानों को पूजते हैं ,वास्तव में वो भगवान् अविनाशी नहीं हैं वो जन्म -मृत्यु में हैंऔर हमें मोक्ष नहीं प्रदान कर सकते।
फिर वो अविनाशी परमात्मा कौन है ? जो मोक्ष दायक है।
और एक सवाल यह भी उठता है मन में कि जब सभी एक ही परमात्मा के बच्चे हैं चाहे वह आज हिंदू हैं ,चाहे मुस्लिम है ,चाहे सिक्ख है ,चाहे ईसाई है वह अपने हिसाब से
अलग-अलग भगवानों की भक्ति क्यों करते हैं ।
आइए हम जानते हैं हमारे पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के बारे में जो सतलोक में विराजमान है जहां हम पहले रहा करते थे और अपनी गलती के कारण इस काल लोक के कुएं में आकर फंस गए ।
" सतलोक"
Satlok is real heaven.
सतलोक, हमारा अपना घर, जहाँ जाकर नैष्कर्मय मुक्ति (बिना काम किए सब कुछ मिल जाता है) प्राप्त होती है।
अब हम उन संतो की बात करते हैं जिन्हें कबीर परमात्मा ने सतलोक दिखाया,उनमें से एक है आदरणीय धर्मदास जी ।
धर्मदास जी बान्धवगढ M.P के रहने वाले थे ,विष्णु उपासक थे,अड़सठ तीर्थ भ्रमण करते थे,एकादशी का व्रत करते थे ।
फिर उन्हें कबीर परमात्मा जिंदा महात्मा के रूप में और उन्हें सच्चा ज्ञान बताया, सच्चे मोक्ष मंत्र प्रदान किए और सतलोक दिखाया फिर उन्हें दृढ़ विश्वास हुआ कि कबीर साहिब ही वास्तव में पूर्ण परमात्मा है।
कबीर परमात्मा धर्मदास जी को समझाते हैं: -
धर्मदास यह जग बौराना कोई ना जाने पद निरवाना।
यही कारण मैं कथा पसारा, जग से कहिए एक राम न्यारा।
राम -राम सब जगत बखाने, आदि राम कोई बिरला ही जाने।
धर्मदास जी द्वारा आंखों देखा सतलोक का वर्णन: -
जहाँ तक दृष्टि गई, धर्मदास जी ने देखा कि प्रकाश झलक रहा था। परमेश्वर (सत्य पुरूष) के दरबार के द्वार पर एक द्वारपाल (सन्तरी) खड़ा था। उसको जिन्दा रूप
में नीचे से गए प्रभु ने कहा कि यह भक्त परमेश्वर जी के दर्शन करने मृतलोक से आया
है, इसको प्रभु के दर्शन कराओ। जिन्दा वेशधारी परमेश्वर बाहर ही बैठ गए और द्वारपाल ने एक अन्य हंस (सत्यलोक में भक्त को हंस तथा भक्तमती को हंसनी कहते हैं) से कहा कि
आप इस भक्त को सत्यपुरूष के दर्शन कराओ। जब वह हंस धर्मदास जी को दर्शन के लिए
लेकर चला तो बहुत सारे हंस आ गए और धर्मदास जी का स्वागत करते हुए नाचते हुए
आगे-आगे चले। उनका शरीर विशाल था, गले में रत्नों की माला थी। उनके नाक, मुख,
गर्दन की शोभा अनोखी थी। सोलह सूर्यों जितना शरीर का प्रकाश था। उनके रोम (शरीर
के बाल) की चमक रत्न (हीरे) जितनी थी। उनका शरीर अमर (अविनाशी) है। सब मिलकर
पुरूष दरबार में गए। सत्यपुरूष जी सिंहासन पर बैठे थे। उनके एक रोम का प्रकाश करोड़
चन्द्रमाओं तथा सूर्यों जितना था। धर्मदास जी ने देखा कि ये तो वही चेहरा है जो नीचे जिन्दा
बाबा के वेश में मिले थे तथा मुझे यहाँ लेकर आए हैं। धर्मदास जी बहुत लज्जित हुए और
विचार करने लगे कि नीचे मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यह जिन्दा ही परमेश्वर हैं।
" सतलोक"
Satlok is real heaven.
सतलोक, हमारा अपना घर, जहाँ जाकर नैष्कर्मय मुक्ति (बिना काम किए सब कुछ मिल जाता है) प्राप्त होती है।
अब हम उन संतो की बात करते हैं जिन्हें कबीर परमात्मा ने सतलोक दिखाया,उनमें से एक है आदरणीय धर्मदास जी ।
धर्मदास जी बान्धवगढ M.P के रहने वाले थे ,विष्णु उपासक थे,अड़सठ तीर्थ भ्रमण करते थे,एकादशी का व्रत करते थे ।
फिर उन्हें कबीर परमात्मा जिंदा महात्मा के रूप में और उन्हें सच्चा ज्ञान बताया, सच्चे मोक्ष मंत्र प्रदान किए और सतलोक दिखाया फिर उन्हें दृढ़ विश्वास हुआ कि कबीर साहिब ही वास्तव में पूर्ण परमात्मा है।
कबीर परमात्मा धर्मदास जी को समझाते हैं: -
धर्मदास यह जग बौराना कोई ना जाने पद निरवाना।
यही कारण मैं कथा पसारा, जग से कहिए एक राम न्यारा।
राम -राम सब जगत बखाने, आदि राम कोई बिरला ही जाने।
धर्मदास जी द्वारा आंखों देखा सतलोक का वर्णन: -
जहाँ तक दृष्टि गई, धर्मदास जी ने देखा कि प्रकाश झलक रहा था। परमेश्वर (सत्य पुरूष) के दरबार के द्वार पर एक द्वारपाल (सन्तरी) खड़ा था। उसको जिन्दा रूप
में नीचे से गए प्रभु ने कहा कि यह भक्त परमेश्वर जी के दर्शन करने मृतलोक से आया
है, इसको प्रभु के दर्शन कराओ। जिन्दा वेशधारी परमेश्वर बाहर ही बैठ गए और द्वारपाल ने एक अन्य हंस (सत्यलोक में भक्त को हंस तथा भक्तमती को हंसनी कहते हैं) से कहा कि
आप इस भक्त को सत्यपुरूष के दर्शन कराओ। जब वह हंस धर्मदास जी को दर्शन के लिए
लेकर चला तो बहुत सारे हंस आ गए और धर्मदास जी का स्वागत करते हुए नाचते हुए
आगे-आगे चले। उनका शरीर विशाल था, गले में रत्नों की माला थी। उनके नाक, मुख,
गर्दन की शोभा अनोखी थी। सोलह सूर्यों जितना शरीर का प्रकाश था। उनके रोम (शरीर
के बाल) की चमक रत्न (हीरे) जितनी थी। उनका शरीर अमर (अविनाशी) है। सब मिलकर
पुरूष दरबार में गए। सत्यपुरूष जी सिंहासन पर बैठे थे। उनके एक रोम का प्रकाश करोड़
चन्द्रमाओं तथा सूर्यों जितना था। धर्मदास जी ने देखा कि ये तो वही चेहरा है जो नीचे जिन्दा
बाबा के वेश में मिले थे तथा मुझे यहाँ लेकर आए हैं। धर्मदास जी बहुत लज्जित हुए और
विचार करने लगे कि नीचे मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यह जिन्दा ही परमेश्वर हैं।
कबीर परमात्मा पृथ्वी पर आकर साधारण मनुष्य की तरह भी लीला कर जाते हैं और किसी को आभास तक नहीं होता कि यह भगवान् है (असंख्य ब्रह्मांडो का स्वामी ) ।


👌🏻👌🏻👌🏻
ReplyDeletegreat spiritual knowledge
ReplyDelete😯😯
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